Thursday, April 28, 2011

जाने किसकी तलाश उनकी आँखों में थी......



जाने किसकी तलाश उनकी आँखों में थी,

आरज़ू के मुसाफिर भटकते रहे,

जितने भी वो चले उतने ही बिछ गए राह में फासले,

ख्वाब मंजिले थी और मंजिले ख्वाब

रास्तों से निकलते रहे रास्ते

जाने किस वास्ते आरज़ू के मुशाफिर भटकते रहे

कोई पुरानी याद रास्ता रोके मुझसे कहती है

इतनी जल्दी धूप में यू कब तक घूमोगे ....

आओ चलके बीतें दिनों की छावं में बैठे

उस लम्हे की बात करे जिसमे कोई फूल खिला था

उस लम्हे की बात करे जिसमे किसी के आवाज़ की चांदी खणक उठी थी

उस लम्हे की बात करे जिसमे किसी की नजरो के मोती बरसे थे

कोई पुरानी याद रास्ता रोके मुझसे कहती है

इतनी जल्दी यू धूप में कब तक घूमोगे

सच तो ये है की चाँद को छूने की तमन्ना की

आसमा को ज़मीन पर माँगा

फूल चाहा की पथरो पर खिले

काटों में की तलाश खुशबू की

आरजू की आग ठंडक दे

बर्फ में ढूंढते रहे गर्मी ...

ख्वाब जो देखा चाहा सच हो जाए

इसकी हमें सजा तो मिलनी थी

सच तो ये है की कुसूर अपना हैं ...........

" नींद के बादलों के पीछे है "




नींद के बादलों के पीछे है मुस्कुराता हुआ एक चेहरा

चेहरे पर बिखरी एक रेशमी लट

सरसराता हुआ कोई आँचल और दो आँखे हैरान हैरान सी...........

नींद के बादलों के पीछे है एक मुलाक़ात, एक हसी लम्हा

झील का ठहरा ठहरा सा पानी

पेड़ पर चह चहाती एक चिड़ियाँ

घास में खिलते नन्हे नन्हे फूल

खुबसूरत लबो पे नर्म सी बात

नींद के बादलों के पीछे है दोपहर एक पिली पिली सी

लोहे की ठंडक के लहजे में

टूटा आईयना, उड़ते कुछ कागज

केचु केचुं बिखरता एक मंजर

पलकों पे झिलमिलाता एक आंसूं

गहरा सन्नाटा ...शोर करता हुआ

नींद के बादलों के पीछे है.................................................